Monday, 6 January 2014

जीवन एक पतंग

                     जीवन एक पतंग
ऊड़ी जा रही है थोड़ी ईधर तो थोड़ी ऊधर,

ऊड़ी जा रही है  थोड़ी  ऊपर तो थोड़ी नीचे

ऊड़ी जा रही है पतंग !!
हवाओ से मित्रता और चमकते सुरज से है डरती,

मानो हवाओ को भी मना लिया हो कि चमकते सुरज की ओर न जाना

ऊगते और ढलते सुरज से नहि उसको कोई बैर,

खुले नीले आसमान मे अठखेलिया करती हुई मानो भर रही है रंग

ऊड़ी जा रही है पतंग !!

मानो हो आसमान की रानी,

पर ये क्या,

यहा तो और भी पतंगे लगी है, होड़ मे बनने को पटरानी

कुछ गिर रही थी कट के,  कुछ लड़ रही थी अब तक,

कुछ और ऊचाँ उड़ने को लगा रही थी होड़।

पतंग ने कहा मुझे और चाहिये ढील, जाना है मुझे इन सबसे दूर।

पतंग तो थी पहले से ही दूर, पर उसकी ईच्छा पूरी करने को दे दी ढील,

पता ही न चला कब मंझा हो गया खत्म।

पतंग ऊड़ चली हवा के संग, अपनो से बहुत दूर

ऊड़ी जा रही है पतंग !!

अब ऊसकी मित्र हवा ही थी ऊसकी सबसे बड़ी शत्रु ,

चमकता सुरज ही दिखा रहा था दूर होता घर,

जहा लौट पाना नही था उसके लिये अब संभव

बहुत दुर, बहुत दुर

ऊड़ी जा रही है पतंग !!



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